Story of Many Daughter

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Story of Many Daughter

बेटी घर -मायका……..

घर का आंगन छोड़ चली वो बागों में त्योहारों में,
याद उसे भी कर लेना सुबह-दिन के उज्यारों में,
बेटी घर से बिदा होगी जब डोली के पैमानों में,
झर-झर आंसू रोयेंगे सब कमरे की चार दीवारों में,
घर की ख़ुशी छुपी रहती है बेटी की मुस्कानो में,
माँ की यादें होती हैं बस बेटी के अफसानों में,
पिता की आंखें नम पड़ी, बीच शादी के मेहमानों में,
ये देख बेटी भाग पड़ी, बीच बचपन के तरानो में,
बीते लम्हे याद करे जब भाई के संग खिलोने में,
कैसे छोड़ू ये घर मैं अब, डूब पड़ी संकोचो में,
जाना तो पड़ेगा मुझको ये सोचे बैठ सखाओं में……….

ससुराल में जाते ही….

आओ बहु घुलो-मिलो सब रिश्तेदारों और महमानो में,
पल में दिखा-दिया ये अंदर मायके वालों और ससुराल वालों में,
फिर किया एक नया सवाल क्या दिया है मायके वालो ने?
मन में सोचा हर बेटी ने, क्या कमी रह गयी सम्मानों में?
बेटी देके सब सोंप दिया है बेटी के घर वालों ने,
फिर क्यों भूख है बढ़ती जाती दहेज़ खाने वालों में……

Dedicated to All Girls and Against to Dowry…….

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