Saharaa

0
225 views
@GoogleImages

उड़ती हुई घटा को बादल का सहारा मिल गया,
डूबती हुई कश्ती को उसका का किनारा मिल गया!

हर लफ्ज़ को मिली फिर उसकी जुबान,
बस रह गए हम तो हमे खुदा का ढिकाना मिल गया!

पलकों के पर्दों को गम आँखों के छुपाना आ गए,
दिल को भी तो रोने का बहाना मिल गया!

हाथों मे लिया हाथ और चल पड़े कदम,
रूका नहीं फिर वक़्त उसको क़यामत का इशारा मिल गया!

महफ़िलों मे रोने लगे और तनहाइयाँ हंसाने लगी,
बहकी हुई निगाहों को जाम का पैमाना मिल गया!

बड़ी ही खूबसूरत थी वो राहें मेरे ख्यालों की,
हुई सुबह तो किरणों का एक नया उजाला मिल गया!

आँखों ने बातें सीख के मेरे होंठो को चुप करा दिया,
बड़ा ही जालिम था ये मौसम न जाने क्या से क्या कर गया!

Leave a Reply