Reality of Life

0
266 views
@GoogleImages

समंदर की परछाई मैं हम कुछ यू डूबने चले,

हाथ तेरा थाम कर, साहिल अपना पूछने चले!

 

बादलों की भीड़ मैं खाव्हिशें कुछ खो गयी,

नाम तेरा रेत पे फिर ढूंढने को हम चले!

 

चल पड़े हैं ये कदम एक अनदेखी सी राह पे,

नम पड़े वो रास्ते अब मुस्कुराने को चले!

 

शाम भी ढलती गयी और रात भी चलती गयी,

भटके हुए मेरे जखम अब साथ तेरे चल पड़े!

 

लो और तेज़ हो गयी शमा मेरी तन्हाई की,

मुझसे बेवफाई कर चले और तेरे पास आ चले!

 

नहीं समझ सकी हूँ मैं ये अजनबी है खेल क्या,

सब तेरी बफा का अब सबूत  हमसे मांगने चले!

 

बड़ा ही नाजुक दौर है और बामुश्किल है ये सफर मेरा,

कुछ तेरा नाम ले के हम अपना नाम दे चले!

Leave a Reply