Uljhan

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उलझने ज़िन्दगी की यु उलझ सी गयी,

खड़े रहे हम राहो मे और कश्तियाँ डूबती रही!

 

फर्क और फासला हमने बहोत करीब से देखा लहरो और समुन्दर के बीच,

कश्तियाँ टकरा कर किनारो से पलटती रही!

 

बड़ी मासूम थी वो हवाएं भी जिनको मैंने महसूस किया,

वो मुझे लोरियां सुनाती रहीं और मैं सुनती रही!

 

जब रेत को मैंने अपने हाथों मे लिया,

वो चुपके से मेरे उँगलियों के फासले से फिसलती रही!

 

रात के चाँद को भी देखा मैंने बहोत गौर से,

सितारों को जब देखा तो रात ढल सी गयी!

 

उम्र भी गुजर गयी तेरा इंतज़ार करते-करते,

अब तो आँखों की नमी भी पलकों को छल सी गयी!

 

बहोत दूर से आयी थी हर हिसाब चुकाने के लिए,

नहीं पता था दौर दुनिया मे पैसो का है रिश्तों को तो दुनिया भूल सी गयी!

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