Waqt ki Kalam

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वक़्त की कलम फिसलने लगी हाथों से क्या पता ये वक़्त नया कुछ लिखवा जाये,
मेरी किताब के पन्ने कुछ अजीब सी झलक दिखला जाये,

हासिल करके जो हासिल न हुआ उसकी अनकही सी गजल सुना जाये,
लफ्ज़ को समझना मेरी आंखों के शब्दों से, ये जरूरी नहीं सब होंठों से कहा जाये,

खुली हुई सरगम के तार को देखा मैंने बिखरते हुए, ये मेरा तजुर्बा हो सके तुमको कुछ सिखा जाये,
लहरो को मत रोकना साहिल पे जाने से पहले, पलट गयी तो कही सुनामी न आ जाये,

नफ्ज़ की धड़कने भी आगे निकल गयी धड़कनों से मेरे दिल की, जाने क्या मौसम एक रुख नया ले आये,
ज़रा सम्हाल के चलो आगे राश्ते मे सिर्फ तूफ़ान ही हैं, फिसलते हुए कदम तुम्हे कही और ही न ले जाये,

सुखी पड़ी हैं सड़के बड़ा ही ज़ोर का एक बबंडर आया होगा, वक़्त-बेवक़्त एक फासला लाया होगा,
मोहोबतओं का ये असर नहीं ये वो जुदाई की आग है, अब पता चला किसी के दिल मे कोई ज्वालामुखी तो आया होगा,

वक़्त की कलम फिसलने लगी हाथों से क्या पता ये वक़्त नया कुछ लिखवा जाये,
मेरी किताब के पन्ने कुछ अजीब सी झलक दिखला जाये!

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