Ki Tarah – A Lovable Poem

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Ki Tarah – A Lovable Poem

पढ़ लो मुझको ज़रा शायरी की तरह, मैं याद हर वक़्त आउंगी तुम्हे मौसकी की तरह,
मत पलटो मुझे किताबों के पन्नो की तरह, तेरे अंदर बसती हूँ मै सांसों की तरह!

जल के बुझ जाने की आदत है मुझे, रोको मत रुला जाउंगी तुम्हे बादलो की तरह,
तकदीर की तरह पास रहती हूँ तेरे, मत ढूंढों मुझे हाथों मे लकीरों की तरह!

लम्हात का ख्याल तो हर सवाल मे था, छोड़ दो उसे किसी और के ख्याल की तरह,
जिस्म फिर रूह का भरोसा तोड़ न दे, भेज दो एक पैगाम फिर कश्ती की तरह!

फिसलती हुई रेत के कुछ लफ्ज़ यू थे, थामे रहो मुझे उसकी आशिक़ी की तरह,
आहट क्या आयी मे भी सुनूँगी उसे, ये भी न लौट जाये तेरी खुश्बू तरह!

ज़र्ज़राहट मे आज क़यामत आयी है यहाँ, तू ही तो नहीं था तूफ़ां मे बबंडर की तरह,
बेपरवाह हो गयी है परवाह मेरी, जबसे आयी हूँ तेरे साथ तेरी ज़िन्दगी की तरह!

ये तारीखे बड़ी मुकम्बल हैं मेरी गुफ्तगू के लिए, चिता जले जो मेरी, तेरी रौशनी की तरह,
मोहोब्बत ने नहीं-साथ ने हराया है तेरे, छोड़ चली हूँ तुझे मै अपनी ख्वाहिशों के तरह!

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