Expectation and Reality of Women

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Expectation and Reality of Women

मैं बेटी हूँ सबसे एक आस लगाए बैठी हूँ,
सम्मानों की हर जन से मैं अरमान जगाये बैठी हूँ,
तिनके सी थी, बड़ी हुई फिर उम्मीदों की प्याली सी मैं,
बाबा की मैं गुड़िया थी, और माँ के दिल की खुशहाली मैं,
पग -पग चलती जाती थी और डुमक-डुमक कर नाची मैं,
पैरों में थी पायल मेरे और हाथों में पहनी थी चूड़ी मैं,
बड़े मज़े से सबकी बातें सुनती और बताती मैं,
दादी मुझको अम्मा बोले और पापा की थी नानी मैं,
समय गया एक समय नया है आया, फिर भी जीती जाती मैं,
मैं कोई सामान नहीं हूँ फिर क्यों सब कुछ सहती जाती मैं,
बाजार तले कभी बेचा जाता, कभी हूँ घर मैं नौकरानी सी मैं,
कभी -कभी है पीटा जाता और जलाई जाती मैं,
रिश्तों में तो है सम्मान फिर क्यों सम्मान न पायी मैं,
मैं भी जीना चाहूँ जीवन फिर क्यों रोकी जाती मैं,
संघर्ष भरा क्यों सफर है मेरा, इसलिए क्या बेटी कहलाई मैं?
इतनी बड़ी उपाधि(बेटी, माँ, पत्नी,बहन)पाकर भी सोच बदल न पायी मैं,
बेटा -बेटी के भेद भाव से हर पल तौली जाती मैं,
बेटा जनम नहीं लेता तो हर पल कोसी जाती मैं,
मैं बेटी हूँ सबसे एक आस लगाए बैठी हूँ,
सम्मानों की हर जन से मैं अरमान जगाये बैठी हूँ,

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