Chal Pade

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चंद तीलियों से आग क्या लगी, सारे सपने भी जल पड़े,
उड़ाती रही रेत आंधिया, और किस्से मेरे धुंए मै उड़ पड़े!

आवाजे कुछ अजीब सी सुनाई पड़ने लगी अब मुझे,
पहचानने को जो निकले हम आहटों मै उलझ पड़े!

बड़ा ही गहरा डर मेरा और रात की तनहाइयाँ,
यूँ लगा मशाल ले के जुगनू सभी निकल पड़े!

तकदीर के उन पन्नो को जब पड़ा मैंने फिर से आज,
खवाब देके आंख मै आसूं मेरे निकल पड़े!

दर्द भी बढ़ने लगा, धड़कने सम्हाल के चलने लगी,
ज़िन्दगी के दौर से बिना कफ़न के चल पड़े!

रात काली हो गयी, इन घटाओं के साथ अब,
चाँद दे गया अलविदा, सितारे भी साथ चल पड़े!

अजीब फिर सवाल वो अजीब सी पनाह मै,
ढूढने सही जगह गलत राह पे चल पड़े!

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